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Dharmendra Pradhan Resignation: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक कैसे पहुंचा छात्र आंदोलन? जानिए पूरे घटनाक्रम की टाइमलाइन

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक पहुंचे छात्र आंदोलन की पूरी कहानी। जंतर-मंतर धरना, अनशन, संसद मार्च और पूरे घटनाक्रम की विस्तृत टाइमलाइन पढ़ें।

दिल्ली, 25 जुलाई।करीब डेढ़ महीने तक चले छात्र आंदोलन और राजनीतिक दबाव के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। इस घटनाक्रम ने देश की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और युवाओं की नाराजगी को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। आंदोलन की शुरुआत भले ही सीमित स्तर पर हुई थी, लेकिन समय के साथ यह जंतर-मंतर के धरने, अनिश्चितकालीन अनशन, संसद चलो मार्च और देशव्यापी विरोध प्रदर्शन में बदल गया।

इस आंदोलन की शुरुआत जून के पहले सप्ताह में हुई, जब प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी को लेकर सोशल मीडिया पर अभियान शुरू हुआ। धीरे-धीरे यह अभियान जमीनी आंदोलन में बदल गया। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करने, परीक्षा प्रणाली में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई।

20 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को नई दिशा मिली। बड़ी संख्या में छात्र और युवा वहां जुटे तथा शांतिपूर्ण तरीके से धरना शुरू हुआ। प्रदर्शन समाप्त करने की प्रशासनिक अपील के बावजूद आंदोलन जारी रहा और प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि उनकी प्रमुख मांगें पूरी होने तक धरना खत्म नहीं होगा।

आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने कई बार बुनियादी सुविधाओं में बाधा डालने के आरोप लगाए। वहीं प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही जाती रही। इस बीच आंदोलन को उस समय नई ऊर्जा मिली जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी जंतर-मंतर पहुंचे और अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए। उनके जुड़ने के बाद आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन मिलने लगा।

अनशन के दौरान डॉक्टरों की निगरानी में वांगचुक के स्वास्थ्य को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही। इसी बीच संसद मार्च का आह्वान किया गया, जिसने आंदोलन को और व्यापक बना दिया। संसद सत्र के दौरान हजारों प्रदर्शनकारी दिल्ली पहुंचे। कई स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई, कुछ मेट्रो स्टेशन अस्थायी रूप से बंद किए गए और पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव भी देखने को मिला।

बाद में वांगचुक को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अस्पताल ले जाया गया। इस कार्रवाई के बाद आंदोलन और तेज हो गया। विभिन्न छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने भी प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आवाज उठाई। कई राज्यों में एकजुटता प्रदर्शन हुए और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग दोहराई गई।

संसद के मानसून सत्र में भी यह मुद्दा लगातार गूंजता रहा। विपक्ष ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई, जबकि सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाने की बात कही। इस बीच आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े रहे।

करीब 26 दिन के अनशन के बाद सोनम वांगचुक ने सरकार से मिले आश्वासन के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया। हालांकि आंदोलन के अन्य नेताओं ने स्पष्ट किया कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक उनका विरोध जारी रहेगा। आखिरकार शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की। इसके बाद आंदोलन के नेतृत्व ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया, हालांकि अन्य मांगों पर संघर्ष जारी रखने की बात भी कही।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि शिक्षा, परीक्षा प्रणाली और युवाओं से जुड़े मुद्दे अब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में हैं। आने वाले समय में सरकार के सामने परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता बहाल करना और छात्रों का विश्वास जीतना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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नजरिया

छात्र आंदोलनों का असर तब सबसे अधिक दिखाई देता है जब उनकी मांगें व्यापक जनसमर्थन हासिल कर लेती हैं। शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, समय पर परीक्षाएं और निष्पक्ष भर्ती आज देश के करोड़ों युवाओं की प्राथमिक चिंता है। सरकार के लिए यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि भरोसा बहाल करने की चुनौती भी है। यदि सुधारात्मक कदम समयबद्ध तरीके से लागू किए जाते हैं तो भविष्य में ऐसे आंदोलनों की आवश्यकता कम होगी। वहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध और संवाद का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिए।

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